अगर आप एक लड़की है या एक औरत है तो बस कहानी शुरु करने से पहले मै आपसे एक सवाल पूछना चाहूँगा| शायद थोडा अजीब लगे आपको मेरा ये सवाल पर कहानी पढ़ते पढ़ते आपको ये समझ आ जायेगा की मेरा ये सवाल कितना जायज़ है| चलिए इन बातो को छोडिये..|
मेरा सवाल है की " आप एक औरत के तौर पर किस के साथ अपनी पूरी ज़िन्दगी बिताना चाहेंगी? एक ऐसे पति के साथ जिसके सामने आप कपड़ो में भी खुद को नंगा सा महसूस करती है या उस आशिक के साथ जिसके सामने आपको निर्वस्त्र होकर भी खुद को सर से लेकर पाँव तक ढका हुआ होने की भावना आती है|
शायद आपका जवाब होगा की आप उस आशिक के साथ जीना चाहेंगी जो आपके अंतर्मन को आपकी बाहरी खूबसूरती के ऊपर तवज्जो देता हो|
मै अपने ही हॉस्पिटल के ICU में एक मरीज के सिरहाने बैठा उसकी कहानी सुन रहा था| उस मरीज की दास्ताँ शायद मुझे इतनी अच्छी लगी की मैंने उसे कलमबंद करना जरुरी समझा| कहानी शुरु होती है मेरे शहर गिरिडीह से| बिजली की लडियो से सजा एक घर ,और उसी घर में ऊँची आवाज में बजता संगीत कानो को बहरा किये जा रहा था| हर चेहरे पे ख़ुशी छाई हुई थी| बच्चे टिंकू जिया के गाने पे जी भर कर नाच रहे थे| घर की साड़ी औरते दुल्हे और दुल्हन की बाते किये जा रही थी| खुशियों की ईमारत में कही शायद एक चेहरे की उदासी दफ़न थी| वो एक पवन पाक रूह थी जो अपनी असीम उदासी के बाद भी खुशियों का लिहाफ डाले शायद सब की खुशियों में खुश होने की कोशिश कर रही थी| और करती भी क्या वो| एक गुनाह जो कर बैठी थी वो| शायद उसका गुनाह बस इतना था की एक लड़की होने के बावजूद भी वो प्यार कर बैठी|शायद उसे इसका भी हक नही था की वो सपने देखे| आज उसकी शादी थी| अपने चेहरे पे ख़ुशी झलकाना उसकी मज़बूरी थी| या फिर शायद ये इसलिए जरुरी था की बाकी सबलोग उदास न हो जाये| कही उसकी बिदाई से पहले कोई आंसू न छलक पड़े| कही कोई अनहोनी इस शादी की ख़ुशी को मातम मे ना बदल दे| इनसब बातो को सोच के ही शायद ही वो सब कुछ भूलने का दिखावा कर रही थी|
अपने हाथो मे गहरी रची मेहंदी को देख कर वो बस यही सोच रही थी की ये गहरा रंग उस शख्स के बेपनाह प्यार को दिखाती है जो उसे मझधार मे छोर गया या फिर ये बस इतना कहती है की उसका होने वाला पति उसे इतना प्यार देगा की वो अपने अतीत को कुछ पलो मे ही भूल जाएगी| शायद घर के हर एक सदस्य के लिए वक़्त बड़ी तेजी से बीता जा रहा था पर उसके लिए तो मानो शायद वक़्त थम सा गया था| हर सपना हर ख्वाब बस टूट ही गया था और उसे इतनी भी इजाजत नही दी गयी थी की वो उन बिखरे हुए ख्वाब के टुकडो को समेट कर एक नयी जिंदगी की रुपरेखा तैयार कर सके या फिर बस उससे उबरने की कोशिश कर सके|
वक़्त थमता तो है नही तो आज कैसे थम सकता था| शाम घिरी और रात भी आई| अब वक़्त था उसे किसी और का होने जाने के लिए अपने वजूद अपने अतीत को भूलकर एक नयी शुरुआत की जो शायद उसे कभी भी मंजूर नही थी| जैसे तैसे शादी हो ही गयी| अब बस बिदाई की रश्म बाकि थी| बस रश्म ही तो बाकी थी असली बिदाई तो उसकी तब ही हो चुकी थी जब उसके घरवालो ने उसका रिश्ता एक ऐसे शख्स से कर दिया था जिसे वो जानती तक नही थी| .फुट फुट कर रो रही थी वो| शायद बिदाई के बहाने वो अपने दिल मे भरा गुबार निकाल रही थी| हर वो दर्द जो उसके दिल मे छुपा था शायद उसे वो आंसुओ से निकाल देना चाहती थी ताकि कोई रंज कोई ग़म न रह जाये| बिदाई की बेला भी टल ही गयी| छलकते नयनो से उसने शायद आखिरी बार देखा होगा अपने उस घर को जिस घर की छत पे खड़े होकर वो अपने चाहने वाले के उसकी गली से गुजरने का इंतज़ार करती थी| .उस चौखट को भी उसने आखिरी बार देखा उसने जिसपे खड़े होकर हर शाम को वो अपने पापा के रसगुल्ले लेकर आने का इंतज़ार करती थी या हर सुबह अपने भाई के साथ टयुसन जाने का| बस आखिरी बार वो जी भर के देखना चाहती थी ताकि इन यादो को अपनी जिंदगी मे पिरो ले| अब बस . शायद अब और नही देख सकती थी वो इन सब को| या यु कह ले देखना नही चाहती थी| और देखे भी तो क्यों कर वो उस मकान को जिसके बाशिंदों ने उसे जीते जी मरने के लिए किसी गैर के आँगन मे भेज दिया|
जैसे तैसे बहुभात की रश्म भी बीत ही गयी| अब तक लोगो की नजरो मे दो रहो का दो आत्माओ का मिलन हो चूका था और अब बारी थी शायद दो जिस्मो के मिलने की और फिर वो इस भौतिक संसार के लिए भी वो दोनों एक होने वाले थे| मायुश घबरायी सी बेचैन सी वो पहुच ही गयी उस सेज पे जो शायद उसी के लिए सजाई गयी थी|
चुप चाप बिस्तर पे बैठे वो अपने पति का इंतज़ार कर रही थी| शायद इन इंतज़ार के लम्हों मे वो अपने उस प्यार को याद कर रही थी जो शायद उसकी जिंदगी के सबसे हसीं लम्हे थे| इन लम्हों को वो चाहकर भी नही भूल सकती थी| शायद उसने ये पल भी उसी के साथ बिताने की सोची होगी| न जाने क्या क्या सपने देखे होंगे उसने इस पल को लेकर| अब सारा ख्वाब बस आँखों मे ही दफन होकर रह गए थे| उसी की यादो मे खोयी थी वो की सहसा दरवाजे पे दस्तक हुई|
ओये दरवाजा खोल ...सो गयी क्या साली ...दरवाजा खोल ...|
शराब के नशे मे झूमते उसके पति ने आवाज दी ..
जी अभी आई ...उसने बिस्तर से आहिस्ते आहिस्ते उतरते हुए कहा|..
जल्दी आती है या .....- इतने मे दरवाजा खुला और वो शराब के नशे मे अपने मर्द होने के गुमान के साथ कमरे मे आया|
फिर उसके पति ने उसके गालो पे एक थप्पड़ जड़ते हुए कहा - साली रंडी .तेरा यार आया था क्या कमरे मे जो दरवाजा बंद कर रखा था| मेरे घर मे मुझे ही आने से रोकती है|.तेरी माँ की ...
वो बेचारी चुप चाप सब सुनती रही|.जिन लबो पे उस एक शख्स ने कभी उदासी को अपना घर बनाने नही दिया था आज उन लबो पे आँखे आंसू बरसा रही थी| जिन गालो पे शायद आजतक किसी ने लाली के अलावा कुछ नही देखा था आज उन गालो पे किसी की उंगलियों के निशां थे| जा जाकर अलमिरे से बोतल निकाल ला विश्की की| .और ४ ग्लास भी लाना|
राजीव सागर पवन अन्दर आओ आजा आज तेरी भाभी के हाथो के पग मारते है ...
जा तू क्या देखती है साली ...जाती है या लगाऊ दो हाथ ...- नशे मे शायद उस नामर्द की मर्दानगी और उसके दोस्तों का शाहस पुरे चरम पर था|उसकी नामर्दगी को सहने के लिए एक बेबस लाचार सी लड़की जो मिल गयी थी उसे| .
बोतले खुली पग भी बने | जिन हाथो से उसने आजतक किसी को एक कप चाय तक बनाकर न पिलाई आज उन्ही हाथो से शराब को ग्लास में डालते हुए वो बस आंसुओ के घुट पीकर रह गयी|
शायद यही उसकी नियति थी| बेचारी कर भी क्या सकती थी जब खुद उसके भाई और पिता ने उसे एक ऐसे आँगन की तुलसी बनाकर भेजा था जहा मर्दानगी के नशे मे चूर मर्द अपनी ही औरतो को अपने दोस्तों के सामने बे -आबरू करते शर्मिंदा नही होते थे| सब नशे मे चूर थे| तभी उसके दोस्तों मे से एक ने कहा - अबे समीर तेरी बीवी तो बड़ी माल है यार| . क्या मस्त गांड है उसकी|
सी बात को गौरवान्वित होने का मुद्दा समझते हुए समीर बोला - छू ले देखता क्या है भाभी है तेरी तेरा भी हक बनता है ..
शायद ये सब उसके भाई या उसके चाहने वाले ने सुना होता तो उस समीर की जबान तोड़ कर उसके हाथ मे दाल देता| पर वो अकेली और कर भी क्या सकती थी सिवाय चुप चाप ये सब सुनने के| .
ये पल शायद उसकी जिंदगी के सबसे बुरे पल थे|. इतनी जिल्लत तो उसने कभी सही नही होगी| पिने और पिलाने का दौर ख़त्म हुआ तो समीर नशे मे चूर हो चूका था|जाते जाते उसके सारे दोस्तों ने टकटकी लगाकर जिस निगाह से देखा उसे उस निगाह मे उसे हैवानियत की बू आ रही थी तो वही उसे खुद के एक नामर्द से ब्याहे जाने पे दुःख हो रहा था| न जाने कितना कोसा होगा उसने अपनी किस्मत को उस पल इसका अंदाजा शायद एक उस जैसी बदनसीब औरत ही लगा सकती है| सारे दोस्त जा चुके थे अब कमरे बस 3 लोग थे| समीर सौम्या और समीर की हैवानियत| सौम्या शायद अब बस मर ही जाना चाहती होगी| आने वाले कुछ पल शायद उसकी जिंदगी के सबसे बुरे पल होने वाले थे| नशे मे चूर वो एक एक कर उसके सारे कपडे उतरता रहा और वो बिना किसी अवरोध के सब सहती रही| .उसके लिए उस पापी के सामने कपडे मे रहना और निर्वस्त्र रहने मे कोई अंतर ही नही महसूस हो रहा होगा|. उसके पति के सामने किसी गैर मर्द ने उसे कपड़ो मे नंगा देखा और वो चुप चाप सुनता रहा उससे और क्या उम्मीद की जा सकती थी|.वो चुप चाप बस यु ही हर परदे को उतरने देती रही|.थोड़ी ही देर मे वो निर्वस्त्र बिस्तर पे पड़ी थी|बस आंसू ही निकाल रहे थे उसकी आँखों से| पर शायद अब वक़्त आ चूका था इन्साफ का| . उसे रोता देख शायद उस नामर्द की नशीली मर्दानगी हैवानियत का रूप लेके जाग चुकी थी|. उसे रोता देख उसने उसे फिर से एक थप्पड़ लगाया|.
साली किसी और का बिस्तर गर्म करने का सपना सजाये बैठी थी क्या जो मेरे निचे आते तुझे रोना आ रहा है रंडी साली|.
शायद अभी उसे ये रंडी शब्द भी सही लग रहा था अपने लिए|.आखिर उसने अपना जिस्म अपनी जान अपनी रूह सब उसके नाम कर दी थी जो उससे मिलो दूर बैठा उसके शादी के ग़म में आठ आठ आंसू बहा रहा होगा| . जब उसने अपना सब कुछ किसी और को दे दिया था तो फिर आज उसे इस गाली से भी अपनापन लग रहा होगा|. जब उसके चाहने वाले के सिवा किसी और ने उसे हाथ लगाया था तो शायद उसने भी खुद को कुछ यही नाम दिया होगा बस फर्क इतना था ये सब सामाजिक मर्यादा टेल हो रहा था|
सच सच बता साली किस किस का बिस्तर गरम कर चुकी है तू ...
वो चुप चाप सब सुनती रही| अब शायद उसका धैर्य जवाब दे चूका था| .उसका निश्चय अब पक्का था| .उसने अपनी जिंदगी का अंजाम तय कर लिया था|. अपने प्यार के लिए वफादार न रह पाने की सजा भी मुकम्मल कर ली थी उसने|. उसका निश्चय दृढ था और उसके मन मे बस एक बात थी की वो बस उसी की होकर मर जाना चाहती जिसे उसने मन से अपना मान लिया था| अब उसे किसी बात का डर नही था न लोक लाज का और न ही अपने घरवालो की इज्जत का| वो बस अपनी बदहाली पे मुस्कुरा रही थी| वो अब बस सदा के लिए उसकी हो जाना चाहती थी जिसे उसने अपना माना था| बस उसी के रंग मे रंग जाना चाहती थी जिसका हर रंग उसे भय था|
नशे मे चूर उसका पति अब बहार जा चूका था| उसने दरवाजा बंद किया| खुद पर थोड़ी की केरोसिन की तेल डाली और आग लगा लिया खुद को|
ये आग शायद उसे पवित्र करने के लिए था| हर उस अपराध से हर उस खता की सजा थी जो शायद उसकी मज़बूरी थी|
थोड़ी ही देर मे बात फ़ैल चुकी थी और आग भी| जैसे तैसे लोगो ने दरवाजा तोडा और आग बुझाई| वो इस कदर जल चुकी थी की उसे आनन् फानन मे नजदीक के बेहतरीन अस्पताल मे भर्ती कराया| और 1-2 दिन के इलाज के बाद मै उसके सिरहाने बैठा मै उसकी कहानी सुन रहा था|
वो अब भी दर्द से करह रही थी| आंसुओ से भीग चूका था मेरा रुमाल पर अब भी आंसू रुके नही थे उसके||
तभी अचानक ecg की मशीन से बीप की आवाज तेज हो गयी| अब शायद उसका अंतिम वक़्त नजदीक आ गया था| वो अब भी मुस्कुरा रही थी|.उसकी यह मुस्कान अद्वितीय थी| निश्छल और निर्द्वंद|
थोड़ी ही देर मे उसने दम तोड़ दिया| पर उसकी मुस्कान उसकी मौत के बाद भी जीवित थी|
मै चुप चाप उसकी बेबसी पे अफ़सोस जता रहा था और यही सोच रहा था की महाशक्ति बनते इस देश मे औरते अब भी इतनी मजबूर थी|
न तो मै उसके प्यार को जानता था और न ही उसके घरवालो को| मै बस ड्यूटी ख़त्म होने का इंतज़ार करने लगा|. ये सोचते हुए की शायद किसी दिन फिर यही कहानी सुनने को मिलेगी| मै रिशेपसन पे गया और signout करते हुए अपने कार की ओर बढ़ चला| . ये दुखद अंत शायद अपनी आबरू के बचाव के संघर्ष की कहानी बनकर मेरे दिल मे हमेशा रहेगा|.
"कुमार"
सार्थक आलेख!
ReplyDeleteshukriya sir... yu hi protsahit karte rahiye..
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