शायद यही उसकी नियती थी और संभवतः आखिरी ईक्षा भी|जिस शराब कि बोतल को उसने ताउम्र गले लगाये रखा उसी शराब कि आखिरी घूंट के साथ आखिरी सांस ने भी उसके साथ छोड़ दिया|
बात ४-५ साल पुरानी ही सही पर आज भी दिल पर उसके निशा यूँ अंकित है कि जब भी माया चाची नजरो के सामने आती है सारी कहानी मानस पटल पे ताज़ी हो जाती है| बात आज भी मुझे बखूबी याद है वो पल जब हम पहली बार गिरिडीह शहर में रहने आये थे तब मेरी क्या प्रतिक्रिया थी जब मैंने अपने पड़ोसियों को पहली बार देखा| अपने दो मंजिले मकान के छत पर जाते ही मैंने बगल के मकान में झाँका तो मेरी आँखें मानो फटी कि फटी रह गयी| टुटा फूटा खपरैल मकान,इधर उधर बिखरे पड़े कुछ पुराने बासन बर्तन, एक गमले में तुलसी का एक पौधा , कुछ पुराने टायर्स और एक बेकार पड़ी साइकिल | इससे ज्यादा कुछ उस घर में होने कि कोई गुंजाईश ही नहीं लग रही थी|शायद इतनी गरीबी मैंने पहली बार देखी थी| शाम ढले हम सभी आराम कर रहे थे और अपने नए मकान को घर बना रहे थे तभी अचानक पड़ोस से मारपीट कि आवाज आई और हमने सब नजरअंदाज करते हुए अपनी बातो में मशगुल रहना उचित समझा| फजीरे सुबह जब नींद खुली तो देखा पड़ोस कि एक औरत अपने आँगन में बैठकर अपने पति को गालिया देती हुई अपने जख्मो को सहला रही थी और पास बैठा उसका पति अपने अपराधबोध के कारण निरुत्तर बैठा चुपचाप साड़ी गालिया सुने जा रहा था|शायद उसने रात को शराब नशे में अपनी पत्नी कि पिटाई कर दी थी और अब अपनी गलती का एहसास होने के बाद शायद वो अपनी भूल सुधार रहा था|सहसा उनकी नजर मेरी माँ पर गयी जो छत के दुसरे कोने से उन्हें देख रही थी| तभी उस औरत ने मेरी माँ से बातचीत शुरू कर दी और फिर थोड़ी देर में ही मै और मेरी माँ उनके घर गए और माया चाची की मरहम पट्टी की| माया चाची रहन सहन से भले ही गरीब और ओछी मानसिकता वाली लगती थी पर नीची जात की होने के बाद भी वो रंग रूप स्वभाव में बिलकुल ऊँचे घराने की औरतो जैसी थी पर शायद गरीबी ने उसके चेहरे की रौनक और शरीर की रंगत छीन ली थी|२७-२८ की उम्र में भी वो ४० साल की लगती थी|गरीबी और लोलुआ(माया चाची का पति) की जुल्म ने शायद उनकी या हालत कर दी थी| यु तो लोलुआ भी शक्ल-ओ-शूरत में एक अदद सभ्य सुसंस्कृत और विकसित सोच वाला भला मानस लगता था| द्वितीय श्रेणी से कला संकाय में स्नातक होने के बाद भी नीची जात का होने के कारण उसे नौकरी नहीं मिल रही थी|भूखा क्या न करता कि लोकोक्ति को चरितार्थ करता हुआ लोलुआ रिक्शा चला कर अपने परिवार का भरण पोषण करता था| इन सब बातो के बीच अचानक माया चाची उठी और चाय बनाने कि खातिर रसोई कि ओर जाने लगी और तभी चक्कर खाकर गिर पड़ी| हमने उन्हें बिस्तर पे लिटाया और फिर उनकी हालत सुधरने पर हम वापस आ गए| एक औरत होने के नाते मेरी माँ ने लोलुआ से बात कर माया चाची कि देखभाल करने पर जोर देना उचित समझा|मेरी माँ ने इस बात को लेकर मेरे पिताजी से बात कि और फिर पिता जी के मान जाने पर तय हुआ कि आज रात को हम उन्हें अपने घर पर बुलाकर उन्हें समझायेंगे|सब कुछ सही था और लोलुआ भी हमारी बात पर अमल करने को राजी हो गया|फिर कुछ दिनों तक सब कुछ शांत रहा| मेरा दाखिला शहर के तथाकथित बेहतरीन स्कूल में करवा दिया गया| शहर अब औधौगीकरण और वैश्वीकरण के प्रभाव में आकर तीव्र प्रगति कर रहा था|कुछ दिनों में ही शहर का रंग रूप बदल गया था| पिछले २-३ महीनो में कई नए रंग देख लिए थे मैंने ज़िन्दगी के। पर कहते है न कि कोई कितना भी अनुभवी क्यों न हो कोई न कोई ऐसी बात होती है जो उसे भी नयी लगती है। औद्योगीकरण से रोज़गार का सृजन हुआ और लोलुआ को मिली नौकरी| थोड़े ही दिनों में लोलुआ ने नयी ज़मीन खरीदी और पुराने घर को किराये पे देकर एक सब्जी कि दूकान खोल ली| माया चची दिन भर दूकान चलती और लोलुआ काम पे जाता| नयी जगह घर बनाकर लोलुआ और माया चाची ने हमलोगों से थोड़ी दूरी बना ली थी| लोलुआ के नए दोस्त बने| दो भाई जीनके नाम जयललवा और हरलालवा| देशी शराब का ठेका खोल कर वो खुद को किसी शहंशाह से कम नहीं समझते थे| लोलुआ से उनकी दोस्ती उसके पैसो कि वजह से थी| नया घर पैसे समृधि सब एक साथ मिले तो इंसान के बहकने के आसार ज्यादा होते है| पैसे के साथ शराबियों से दोस्ती और फिर वही दौर शुरू हो गया था जो हमारे आने से पहले था| लोलुआ शराब के नशे में हर शाम चूर रहता था और परेशानियां माया चाची को सहनी पड़ती| शराब के नशे में चूर लोलुआ और उसके दोस्तों को माया चाची मज़बूरी में सहती थी| वक्त बीतता गया और फिर उनकी जिंदगी में खुशिया आई|माया चाची माँ बनने वाली थी| वो हमारे घर पर ये बात बताने आई थी| और साथ में लायी थी गठरी भर लोलुआ कि शिकायत जो कि औरतो कि आदत होती है|शिकायत का दौर देर शाम तक चला| सारी बाते खुलकर सामने राखी गयी| सबे सूरी बात जो मुझे लगी वो थी लोलुआ के दोस्तों कि छिछोरी हरकते जो माया चाची को मानसिक तौर पर परेशान करती थी| हमलोगों ने फिर लोलुआ से बात करने कि ठानी| हम उसके घर पर थे अगले दिन| माया चाची जिसे अपने शब्दों म दैत्य बता रही थी वो दिन में एक देवता तुल्य इंसान जान पड़ रहा था| लोलुआ ने शराब घर में ना पिने कि बात पर शःमती जताई| सबकुछ ठीक ठाक चलने लगा| माया चाची ने दो लडको को जन्म दिया| नाम आशीष और नीतिश रखे| वक्त के साथ साथ बच्चे थोड़े बड़े हो गए|जहा हम क्रिकेट खेलते थे वही वो बच्चे भी खेला करते थे| जैसे ही शाम को लोलुआ घर आता था वो उससे पैसे मांगते और दूकान कि ओर दौड पड़ते| उन्हें गुब्बारों का शौक था| फिर हम सब मिलकर उन्हें चिढाते हुए कहते थे- लोलुआ के बाते दौड दौड दोकना कि लबे रे बेटा लाल लाल फोकना?? वो इस बात पे खूब चिढते और हम सारे मिलकर उन्हें सताते थे| घूमते घूमते वक्त का पहिया उस एक और सुखद साल को अंत पे ले आया था| दिसम्बर कि धुप सुहानी हो चली थी| फिर एक दिन हमने सोचा कि चलो आज लोलुआ के घर चले| हम सब उसके घर पहुचे तो वह जो देखा वो देखने लायक नहीं था| लोलुआ अपने ३-४ शराबी दोस्तों के साथ शराब के नशे में चूर था| लोलुआ चाची उनके लिए कुछ खाने का बना कर परोस रही थी तो उनमे से एक ने माया चाची के शारीर को हाथ लगाया| लोलुआ ने सब देखकर भी अनदेखा कर दिया| मुझसे ये बर्दास्त नही हुआ और मैंने एक लात मारते हुए उस शख्स को किनारे कि ओर कर दिया| नशे में चूर वो वही पड़ा रहा| बाकी शराबी चुप चाप वह से निकल गए| अब उस आँगन में हमारे परिवार के अलावा लोलुआ और माया चाची थे| लोलुआ अपने दोस्तों कि बेइज्जती से तिलमिलाया हुआ था| अपने गुस्सा उसने माया चाची पर उतारते हुए कहा कि "शाली क्या रिश्ता है तेरा इनलोगों से जो हर बार रोते हुए इनके पास चली जाती है" चुप चाप घर में बैठा कर वरना हाथ पैर तोड़ दूँगा फिर घूमते रहना जहा जहा घूमना हो...... मेरे पापा से ये बर्दाश्त नही हुआ और वो लोलुआ के पास जाकर खड़े हो गए| पापा को पास खड़ा देखकर न जाने उसे क्या हुआ उसने पापा को मारने के लिए पास पड़ी कुर्सी उठा ली| उस एक पल में मेरी माँ ने मुझे यु देखा मानो वो कह रही हो कि - बेटे अब वक्त आ गया है कुछ करने का बचा ले अपने पापा को| सारा क़र्ज़ चुकता कर दे| मैंने बिना कुछ सोचे समझे लोलुआ को जोर का धक्का दिया| वो वही पास में जाकर गिर पड़ा| फिर उठा और लडखडाकर गिर पड़ा| माया चाची कि पलके भीग चुकी थी| हमने वहाँ से उठाकर लोलुआ को बिश्तार पे लिटाया और घर कि ओर चल पड़े| ४-५ साल पुराना रिश्ता अब टूटने कि कगार पर आ चूका था| हमने फिर सारे ताल्लुकात तोड़ लिए उनलोगों से| २-३ बार माया चाची हमारे घर आई हमसे माफ़ी मांगने| पर हमने टूटे रिश्तों को ना जोड़ना ही उचित समझा| कैलेंडर उस दिन ३१ दिसम्बर कि तारिख दिखा रहा था| साल का अंत| उस रात में देर तक पढ़ रहा था ताकि पहली जनवरी को मस्ती करू तो माँ पापा रोके नही मुझे| रात के २ बज चुके थे|पटाखों का शोर कम हो चला था| नागपुरी गाने कानो को परेशान कर रहे थे| तभी पास से किसी शराबी के चिल्लाने कि आवाज़ आई| फिर यु लगा मानो कोई हमारे दरवाज़े के सामने गिर पड़ा हो| दरवाज़ा खोला तो देखा पास ही लोलुआ शराब पीकर गिरा हुआ था| नशे में चूर| मैंने माँ पापा को बुलाया| वो तबतक सम्हाल चूका था खुद को| माँ को देखते ही उसने कहा - काकी हाम लोलुआ हियो चिन्ली कि ना (चाची मै लोलुआ हू आपने पहचाना या नहीं) माँ ने जवाब दिया- तुने कसम खायी है क्या कि शराब पीना नहीं छोडेगा?और ये कपड़ो में क्या रखा है? लोलुआ ने तभी अपनी कपड़ो से पैसे निकलते हुए कहा- चाची मायवे कहियो इतना पैसा नाय दाखले हे| वकरा आज खुश केर दबे काकी (चाची माया ने कभी इतने पैसे नहीं देखे है|आज मै उसे खुश कर दूंगा) पैसे काफी थे|कुछ ३०-४० हज़ार रहे होंगे|ना जाने कहा से लूट के लाया था| पूछने पर कहा उसने कि जुए में जीते है| माँ ने तभी उससे कहा देख लोलुआ तू नशे में है ये पैसे मै रख देती हूँ कल आके ले जाना और अभी १० हज़ार रख ये माया को जाकर दे देना| जाते जाते वो कह गया कि आज के बाद शराब नहीं पिएगा और न ही माया चाची को मारेगा|माफ़ी भी मांगी उसे| वो उस दिन भी नशे में थे और आज भी पर शायद आज कोई और ही रूप दिखाकर हमे सोचने पर मजबूर कर गया कि वो कही न कही आज भी अपने अंदर अच्छाई छुपाये थे| माँ ने दरवाज़ा बंद किया और फिर सरे पैसे अल्मिरे में डालते हुए मुझे भी सो जाने को कहा| मै भी सो चूका था| तभी अचानक दरवाज़े पे दस्तक हुई| माया चाची परेशान थी|लोलुआ अबतक घर नही पंहुचा था| सुबह के ७ बज चुके थे|तभी किसी ने कहा कि उसने उसे हरलालवा के घर जाते हुए देखा था| इस अपरिचित सी आवाज द्वारा कहे गए शब्दों से ना जाने कैसी बिजली सी कौंधी मेरे मन में कि फिर मै और पापा दोनों हरलालवा के घर कि ओर दौड पड़े| मोहल्ले वाले भी हमारे पीछे आये| जैसे ही हम हरलालवा के घर पहुचे हमने देखा कि वो किसी चीज को बोरे में लपेट कर कही ले जा रहे है| हमे आता देखकर उन्होंने सबकुछ छोड़कर भागने उचित समझा पर तभी वो दोनों भाई पकडे गए| हमने बोरे को खोल कर देखा तो उसमे लोलुआ कि लाश पड़ी थी| बात साफ़ हो चुकी थी| पुलिस आई और पंचनामा हुआ| उनदोनो ने बयां दिया कि लोलुआ उनके घर बकाया पैसे देने आया था और फिर न जाने कैसे फिसल कर कुए में गिर पड़ा| थोड़ी ही सख्ती और सजा कम करने के एवज में उन्होंने सब कबूल लिया| उन्होंने लोलुआ को जान बूझकर मारा था| बात यही खत्म हो गयी माया चाची अपने मायके में रहती है आजकल| पर आज सुबह जब मै उस कुए के पास से गुजार रहा था तो यु आभास हुआ मानो लोलुआ वहाँ कुए कि मेड पर बैठा हुआ हो| हाथ में एक शराब कि बोतल लिए| शायद लोगो को ये बताने के लिए कि जिस शराब कि बोतल को उसने ताउम्र गले लगाये रखा उसी शराब कि आखिरी घूंट के साथ आखिरी सांस ने भी उसका साथ छोर दिया| शायद यही चाहता है वो भी कि कोई और घर शराब कि वजह से ना लूटे| कोई और मांग न उजड़े|.... |
shayad uska kasoor bas itna tha ki usne pyar kiya wo bhi ek aise shakhs se jise khwahish to puri duniya ki thi par wo parde ke pichhe chhupkar har manjar ko badalte dekhna chahta tha aur bas jeetna chahta tha har chij har shakhs ko. "KUMAR"
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Tuesday, January 17, 2012
लोलुआ
Saturday, January 14, 2012
आबरू
अगर आप एक लड़की है या एक औरत है तो बस कहानी शुरु करने से पहले मै आपसे एक सवाल पूछना चाहूँगा| शायद थोडा अजीब लगे आपको मेरा ये सवाल पर कहानी पढ़ते पढ़ते आपको ये समझ आ जायेगा की मेरा ये सवाल कितना जायज़ है| चलिए इन बातो को छोडिये..|
मेरा सवाल है की " आप एक औरत के तौर पर किस के साथ अपनी पूरी ज़िन्दगी बिताना चाहेंगी? एक ऐसे पति के साथ जिसके सामने आप कपड़ो में भी खुद को नंगा सा महसूस करती है या उस आशिक के साथ जिसके सामने आपको निर्वस्त्र होकर भी खुद को सर से लेकर पाँव तक ढका हुआ होने की भावना आती है|
शायद आपका जवाब होगा की आप उस आशिक के साथ जीना चाहेंगी जो आपके अंतर्मन को आपकी बाहरी खूबसूरती के ऊपर तवज्जो देता हो|
मै अपने ही हॉस्पिटल के ICU में एक मरीज के सिरहाने बैठा उसकी कहानी सुन रहा था| उस मरीज की दास्ताँ शायद मुझे इतनी अच्छी लगी की मैंने उसे कलमबंद करना जरुरी समझा| कहानी शुरु होती है मेरे शहर गिरिडीह से| बिजली की लडियो से सजा एक घर ,और उसी घर में ऊँची आवाज में बजता संगीत कानो को बहरा किये जा रहा था| हर चेहरे पे ख़ुशी छाई हुई थी| बच्चे टिंकू जिया के गाने पे जी भर कर नाच रहे थे| घर की साड़ी औरते दुल्हे और दुल्हन की बाते किये जा रही थी| खुशियों की ईमारत में कही शायद एक चेहरे की उदासी दफ़न थी| वो एक पवन पाक रूह थी जो अपनी असीम उदासी के बाद भी खुशियों का लिहाफ डाले शायद सब की खुशियों में खुश होने की कोशिश कर रही थी| और करती भी क्या वो| एक गुनाह जो कर बैठी थी वो| शायद उसका गुनाह बस इतना था की एक लड़की होने के बावजूद भी वो प्यार कर बैठी|शायद उसे इसका भी हक नही था की वो सपने देखे| आज उसकी शादी थी| अपने चेहरे पे ख़ुशी झलकाना उसकी मज़बूरी थी| या फिर शायद ये इसलिए जरुरी था की बाकी सबलोग उदास न हो जाये| कही उसकी बिदाई से पहले कोई आंसू न छलक पड़े| कही कोई अनहोनी इस शादी की ख़ुशी को मातम मे ना बदल दे| इनसब बातो को सोच के ही शायद ही वो सब कुछ भूलने का दिखावा कर रही थी|
अपने हाथो मे गहरी रची मेहंदी को देख कर वो बस यही सोच रही थी की ये गहरा रंग उस शख्स के बेपनाह प्यार को दिखाती है जो उसे मझधार मे छोर गया या फिर ये बस इतना कहती है की उसका होने वाला पति उसे इतना प्यार देगा की वो अपने अतीत को कुछ पलो मे ही भूल जाएगी| शायद घर के हर एक सदस्य के लिए वक़्त बड़ी तेजी से बीता जा रहा था पर उसके लिए तो मानो शायद वक़्त थम सा गया था| हर सपना हर ख्वाब बस टूट ही गया था और उसे इतनी भी इजाजत नही दी गयी थी की वो उन बिखरे हुए ख्वाब के टुकडो को समेट कर एक नयी जिंदगी की रुपरेखा तैयार कर सके या फिर बस उससे उबरने की कोशिश कर सके|
वक़्त थमता तो है नही तो आज कैसे थम सकता था| शाम घिरी और रात भी आई| अब वक़्त था उसे किसी और का होने जाने के लिए अपने वजूद अपने अतीत को भूलकर एक नयी शुरुआत की जो शायद उसे कभी भी मंजूर नही थी| जैसे तैसे शादी हो ही गयी| अब बस बिदाई की रश्म बाकि थी| बस रश्म ही तो बाकी थी असली बिदाई तो उसकी तब ही हो चुकी थी जब उसके घरवालो ने उसका रिश्ता एक ऐसे शख्स से कर दिया था जिसे वो जानती तक नही थी| .फुट फुट कर रो रही थी वो| शायद बिदाई के बहाने वो अपने दिल मे भरा गुबार निकाल रही थी| हर वो दर्द जो उसके दिल मे छुपा था शायद उसे वो आंसुओ से निकाल देना चाहती थी ताकि कोई रंज कोई ग़म न रह जाये| बिदाई की बेला भी टल ही गयी| छलकते नयनो से उसने शायद आखिरी बार देखा होगा अपने उस घर को जिस घर की छत पे खड़े होकर वो अपने चाहने वाले के उसकी गली से गुजरने का इंतज़ार करती थी| .उस चौखट को भी उसने आखिरी बार देखा उसने जिसपे खड़े होकर हर शाम को वो अपने पापा के रसगुल्ले लेकर आने का इंतज़ार करती थी या हर सुबह अपने भाई के साथ टयुसन जाने का| बस आखिरी बार वो जी भर के देखना चाहती थी ताकि इन यादो को अपनी जिंदगी मे पिरो ले| अब बस . शायद अब और नही देख सकती थी वो इन सब को| या यु कह ले देखना नही चाहती थी| और देखे भी तो क्यों कर वो उस मकान को जिसके बाशिंदों ने उसे जीते जी मरने के लिए किसी गैर के आँगन मे भेज दिया|
जैसे तैसे बहुभात की रश्म भी बीत ही गयी| अब तक लोगो की नजरो मे दो रहो का दो आत्माओ का मिलन हो चूका था और अब बारी थी शायद दो जिस्मो के मिलने की और फिर वो इस भौतिक संसार के लिए भी वो दोनों एक होने वाले थे| मायुश घबरायी सी बेचैन सी वो पहुच ही गयी उस सेज पे जो शायद उसी के लिए सजाई गयी थी|
चुप चाप बिस्तर पे बैठे वो अपने पति का इंतज़ार कर रही थी| शायद इन इंतज़ार के लम्हों मे वो अपने उस प्यार को याद कर रही थी जो शायद उसकी जिंदगी के सबसे हसीं लम्हे थे| इन लम्हों को वो चाहकर भी नही भूल सकती थी| शायद उसने ये पल भी उसी के साथ बिताने की सोची होगी| न जाने क्या क्या सपने देखे होंगे उसने इस पल को लेकर| अब सारा ख्वाब बस आँखों मे ही दफन होकर रह गए थे| उसी की यादो मे खोयी थी वो की सहसा दरवाजे पे दस्तक हुई|
ओये दरवाजा खोल ...सो गयी क्या साली ...दरवाजा खोल ...|
शराब के नशे मे झूमते उसके पति ने आवाज दी ..
जी अभी आई ...उसने बिस्तर से आहिस्ते आहिस्ते उतरते हुए कहा|..
जल्दी आती है या .....- इतने मे दरवाजा खुला और वो शराब के नशे मे अपने मर्द होने के गुमान के साथ कमरे मे आया|
फिर उसके पति ने उसके गालो पे एक थप्पड़ जड़ते हुए कहा - साली रंडी .तेरा यार आया था क्या कमरे मे जो दरवाजा बंद कर रखा था| मेरे घर मे मुझे ही आने से रोकती है|.तेरी माँ की ...
वो बेचारी चुप चाप सब सुनती रही|.जिन लबो पे उस एक शख्स ने कभी उदासी को अपना घर बनाने नही दिया था आज उन लबो पे आँखे आंसू बरसा रही थी| जिन गालो पे शायद आजतक किसी ने लाली के अलावा कुछ नही देखा था आज उन गालो पे किसी की उंगलियों के निशां थे| जा जाकर अलमिरे से बोतल निकाल ला विश्की की| .और ४ ग्लास भी लाना|
राजीव सागर पवन अन्दर आओ आजा आज तेरी भाभी के हाथो के पग मारते है ...
जा तू क्या देखती है साली ...जाती है या लगाऊ दो हाथ ...- नशे मे शायद उस नामर्द की मर्दानगी और उसके दोस्तों का शाहस पुरे चरम पर था|उसकी नामर्दगी को सहने के लिए एक बेबस लाचार सी लड़की जो मिल गयी थी उसे| .
बोतले खुली पग भी बने | जिन हाथो से उसने आजतक किसी को एक कप चाय तक बनाकर न पिलाई आज उन्ही हाथो से शराब को ग्लास में डालते हुए वो बस आंसुओ के घुट पीकर रह गयी|
शायद यही उसकी नियति थी| बेचारी कर भी क्या सकती थी जब खुद उसके भाई और पिता ने उसे एक ऐसे आँगन की तुलसी बनाकर भेजा था जहा मर्दानगी के नशे मे चूर मर्द अपनी ही औरतो को अपने दोस्तों के सामने बे -आबरू करते शर्मिंदा नही होते थे| सब नशे मे चूर थे| तभी उसके दोस्तों मे से एक ने कहा - अबे समीर तेरी बीवी तो बड़ी माल है यार| . क्या मस्त गांड है उसकी|
सी बात को गौरवान्वित होने का मुद्दा समझते हुए समीर बोला - छू ले देखता क्या है भाभी है तेरी तेरा भी हक बनता है ..
शायद ये सब उसके भाई या उसके चाहने वाले ने सुना होता तो उस समीर की जबान तोड़ कर उसके हाथ मे दाल देता| पर वो अकेली और कर भी क्या सकती थी सिवाय चुप चाप ये सब सुनने के| .
ये पल शायद उसकी जिंदगी के सबसे बुरे पल थे|. इतनी जिल्लत तो उसने कभी सही नही होगी| पिने और पिलाने का दौर ख़त्म हुआ तो समीर नशे मे चूर हो चूका था|जाते जाते उसके सारे दोस्तों ने टकटकी लगाकर जिस निगाह से देखा उसे उस निगाह मे उसे हैवानियत की बू आ रही थी तो वही उसे खुद के एक नामर्द से ब्याहे जाने पे दुःख हो रहा था| न जाने कितना कोसा होगा उसने अपनी किस्मत को उस पल इसका अंदाजा शायद एक उस जैसी बदनसीब औरत ही लगा सकती है| सारे दोस्त जा चुके थे अब कमरे बस 3 लोग थे| समीर सौम्या और समीर की हैवानियत| सौम्या शायद अब बस मर ही जाना चाहती होगी| आने वाले कुछ पल शायद उसकी जिंदगी के सबसे बुरे पल होने वाले थे| नशे मे चूर वो एक एक कर उसके सारे कपडे उतरता रहा और वो बिना किसी अवरोध के सब सहती रही| .उसके लिए उस पापी के सामने कपडे मे रहना और निर्वस्त्र रहने मे कोई अंतर ही नही महसूस हो रहा होगा|. उसके पति के सामने किसी गैर मर्द ने उसे कपड़ो मे नंगा देखा और वो चुप चाप सुनता रहा उससे और क्या उम्मीद की जा सकती थी|.वो चुप चाप बस यु ही हर परदे को उतरने देती रही|.थोड़ी ही देर मे वो निर्वस्त्र बिस्तर पे पड़ी थी|बस आंसू ही निकाल रहे थे उसकी आँखों से| पर शायद अब वक़्त आ चूका था इन्साफ का| . उसे रोता देख शायद उस नामर्द की नशीली मर्दानगी हैवानियत का रूप लेके जाग चुकी थी|. उसे रोता देख उसने उसे फिर से एक थप्पड़ लगाया|.
साली किसी और का बिस्तर गर्म करने का सपना सजाये बैठी थी क्या जो मेरे निचे आते तुझे रोना आ रहा है रंडी साली|.
शायद अभी उसे ये रंडी शब्द भी सही लग रहा था अपने लिए|.आखिर उसने अपना जिस्म अपनी जान अपनी रूह सब उसके नाम कर दी थी जो उससे मिलो दूर बैठा उसके शादी के ग़म में आठ आठ आंसू बहा रहा होगा| . जब उसने अपना सब कुछ किसी और को दे दिया था तो फिर आज उसे इस गाली से भी अपनापन लग रहा होगा|. जब उसके चाहने वाले के सिवा किसी और ने उसे हाथ लगाया था तो शायद उसने भी खुद को कुछ यही नाम दिया होगा बस फर्क इतना था ये सब सामाजिक मर्यादा टेल हो रहा था|
सच सच बता साली किस किस का बिस्तर गरम कर चुकी है तू ...
वो चुप चाप सब सुनती रही| अब शायद उसका धैर्य जवाब दे चूका था| .उसका निश्चय अब पक्का था| .उसने अपनी जिंदगी का अंजाम तय कर लिया था|. अपने प्यार के लिए वफादार न रह पाने की सजा भी मुकम्मल कर ली थी उसने|. उसका निश्चय दृढ था और उसके मन मे बस एक बात थी की वो बस उसी की होकर मर जाना चाहती जिसे उसने मन से अपना मान लिया था| अब उसे किसी बात का डर नही था न लोक लाज का और न ही अपने घरवालो की इज्जत का| वो बस अपनी बदहाली पे मुस्कुरा रही थी| वो अब बस सदा के लिए उसकी हो जाना चाहती थी जिसे उसने अपना माना था| बस उसी के रंग मे रंग जाना चाहती थी जिसका हर रंग उसे भय था|
नशे मे चूर उसका पति अब बहार जा चूका था| उसने दरवाजा बंद किया| खुद पर थोड़ी की केरोसिन की तेल डाली और आग लगा लिया खुद को|
ये आग शायद उसे पवित्र करने के लिए था| हर उस अपराध से हर उस खता की सजा थी जो शायद उसकी मज़बूरी थी|
थोड़ी ही देर मे बात फ़ैल चुकी थी और आग भी| जैसे तैसे लोगो ने दरवाजा तोडा और आग बुझाई| वो इस कदर जल चुकी थी की उसे आनन् फानन मे नजदीक के बेहतरीन अस्पताल मे भर्ती कराया| और 1-2 दिन के इलाज के बाद मै उसके सिरहाने बैठा मै उसकी कहानी सुन रहा था|
वो अब भी दर्द से करह रही थी| आंसुओ से भीग चूका था मेरा रुमाल पर अब भी आंसू रुके नही थे उसके||
तभी अचानक ecg की मशीन से बीप की आवाज तेज हो गयी| अब शायद उसका अंतिम वक़्त नजदीक आ गया था| वो अब भी मुस्कुरा रही थी|.उसकी यह मुस्कान अद्वितीय थी| निश्छल और निर्द्वंद|
थोड़ी ही देर मे उसने दम तोड़ दिया| पर उसकी मुस्कान उसकी मौत के बाद भी जीवित थी|
मै चुप चाप उसकी बेबसी पे अफ़सोस जता रहा था और यही सोच रहा था की महाशक्ति बनते इस देश मे औरते अब भी इतनी मजबूर थी|
न तो मै उसके प्यार को जानता था और न ही उसके घरवालो को| मै बस ड्यूटी ख़त्म होने का इंतज़ार करने लगा|. ये सोचते हुए की शायद किसी दिन फिर यही कहानी सुनने को मिलेगी| मै रिशेपसन पे गया और signout करते हुए अपने कार की ओर बढ़ चला| . ये दुखद अंत शायद अपनी आबरू के बचाव के संघर्ष की कहानी बनकर मेरे दिल मे हमेशा रहेगा|.
"कुमार"
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